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Monday, 15 December 2014

हम रचनायें ऐसे ही तो गढतें हैं 
जब यादें बचपन की आती हैं
जब बिछडे दोस्‍त सतातें हैं 
जब बड़ा होना अखरता है
पर जिम्‍मेदारी होती है 
तभी भाव उमड़तें है
फिर रचनायें हम लिखतें है
जब प्‍यार किसी से करतें हैं
जब प्‍यारा कोई लगता है
जब याद किसी को करतें हैं
जब अपना कोई लगता है
जब किसी को अपना कहतें हैं
जब इकरार प्‍यार का करतें हैं
प्‍यार नहीं जब मिलता हैं
जब खुशी प्‍यार में मिलती है
महबूबा जब मिल जाती है
जब जीत प्‍यार में मिलती है
तभी तो रचनायें लिखतें हैं
जब मॉ की याद सताती है
जब बाबा भावुक होतें है
जब बहना छोटकी रोती है
जब भाई भइया कहता है
जब दिल का प्‍यार निकलता है
हम रचनायें तभी तो रचतें है
.......आनन्‍द विक्रम 

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