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Wednesday, 20 April 2016

कुछ तथाकथि‍त साहित्यकार साहित्य में हदय के उद्गार कम मन के कुविचार ,मन की कुंठा ज्यादा लिखतें हैं । ये बहुत ही निंदनीय और शर्मनाक है । बहुत जल्दी प्रसिद्ध होने के ख्याल से लिखा गया ऐसा साहित्य समाज के लिए भी अभि‍शाप है । ऐसे साहित्यकार समाज को क्या पढाना चाहतें है इनके लिखे को पढकर मन उद्वविग्न हो जाता है ,मन कसैला  हो जाता है । साहित्य पढे़ लिखों का समाज माना जाता है और यहॉ समाज के आरोप-प्रत्यारोप एवं गाली-गलौच को भी सभ्य भाषा में ढालकर पढने लायक भाषा में ढाला जाता है ताकि किसी को पढनें में बुरा न लगे । ये तथाकथ‍ित साहित्यकार तो परदे के बाहर एकदम यूॅ ही निर्वस्त्र नाचने को तैयार बैठे है । कहने को तो पढ़े लिखे पी०एच०डी किये सभ्य समाज से आयें हैं लेकिन मानसिकता बहुत ही तुच्छ है । मानते हैं कि विचारों की स्वतन्त्रता सबको है लेकिन इस स्वतन्त्रता में नैतिकता से पलायन कर जायें भला ये क्या बात हुई । ऐसे तथाकथ‍ित साहित्यकारों की कडी निन्दा की जानी चाहिए और खुले मंच से विरोध किया जाना चाहिए । 

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