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Thursday, 21 April 2016

                           समाचार पत्रों में साहित्‍य‍िक पन्‍नें

                   जो भी समाचार पत्र उठायें सब विज्ञापनों के बोझ से दबे रहतें है और ठीक भी है इन्‍हीं के दम पर तो निकलता भी है । देश-विदेश का समाचार ढाई से चार रुपये में म‍िल जाता है ,कौन आया ,गया , कहॉ चोरी हुई ,कौन पकड़ा गया , कौन जीता और कौन हारा , किस राजनेता ने किसको क्‍या कहा  और तो और खेल के समाचार भी अप टू डेट होतें है । एक बस साहित्‍य के साथ ही सौतेला व्‍यवहार होता है । ऐसा नही है कि इसका पन्‍ना नहीं होता है , होता है लेकिन खानापूर्ति की तरह कि कोई कहने न पाये कि फलॉ  समाचार पत्र में साहित्‍य का कालम नहीं होता है । हम कहतें कि ऐसा आधा तिहा पन्‍ना होने से क्‍या फायदा । सप्‍ताह में वो भी आधा पन्‍ना भला ऐ भी कोई बात हुई । मुॅह झूठा कराने वाली बात हो गयी । अगर यही आधा पन्‍ना भी प्रति दिन निकले तो बहुत है । न जाने कितने तो साहित्‍य‍िक कार्यक्रम देशभर में होतें रहतें है ,कितनी पुस्‍तकों का लोकार्पण भी होता है , आये दिन कवि सम्‍मेलनों के कार्यक्रम होतें रहतें हैं , सामाजिक एवं सास्‍कृत‍िक संस्‍थायें विद्वानों / लेखकों को पुरस्‍कारों एवं सम्‍मानों से सम्‍मानित करतें रहतें है । ऐसी खबरें नगण्‍य होतीं हैं बल्‍क‍ि ये कहेंगे ऐसे समाचारों की टोह ही नहीं ली जाती है । जो प्रकाशित भी होता है ,थोड़ा कहने में संकोच लगता है, वो लेखकों रचनाकारों के स्‍वयं के प्रयास के फलस्‍वरुप प्रकाश‍ित होता है । ऐसी सूचनायें आप प्रेस में देने जायें तो ,जो लोग कभी गयें होंगें जानतें होंगे , बडा अजीब तरह का मुॅह बनातें है ।
                      भला हो फेसबुक का कि आजकल ऐसी बहुत से समाचार यहीं मिल जातें  हैं । किस पुस्‍तक का कहॉ लोकार्पण हुआ ,किसे कौन सा सम्‍मान मिला , कहॉ कवि गोष्‍ठी का आयोजन हुआ और आजकल साहित्‍य में नया क्‍या चल रहा है । अगर ये फेसबुक , गूगल ,ट्यूटर और ब्‍लॉग आदि न होते तो निरीह साहित्‍यकार कहॉ जाते  । हम तो नेट की दुनिया के इन जैसे सभी आभासी दुनिया का दिल से आभार व्‍यक्‍त करतें हैं  कि हमारे दुखों को भली भॅति समझतें हैं ।

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